सालानपुर: समय के साथ समाज का ताना-बाना बदला है और पुरानी कहानियां भी धुंधली पड़ने लगी हैं, लेकिन पश्चिम बर्धमान जिले के सालानपुर ब्लॉक स्थित छोटे से गांव ‘डाबरग्राम’ में कदम रखते ही लगता है मानो वक्त ठहर सा गया हो। यहां आज भी लगभग 175 वर्षों से अधिक पुरानी विरासत और परंपरा जीवंत है— माहाता परिवार का ऐतिहासिक शारदोत्सव।
लगभग 175 वर्ष पूर्व, तत्कालीन कुल्टी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले डाबरग्राम के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में इस दुर्गोत्सव की नींव दीनबंधु माहाता ने रखी थी। दीनबंधु माहाता अपने समय के प्रतिष्ठित साधक होने के साथ-साथ एक बड़े व्यवसायी भी थे। उनके द्वारा शुरू की गई यह पूजा आज सिर्फ माहाता परिवार ही नहीं, बल्कि समूचे डाबरग्राम के गौरव, आस्था और आनंद का प्रतीक बन चुकी है।
बदलते वक्त के साथ आजीविका और उच्च शिक्षा के सिलसिले में परिवार के कई सदस्य देश-दुनिया के अलग-अलग कोनों में बस चुके हैं, लेकिन आश्विन मास में जैसे ही ढाक की गूंज सुनाई देती है, सभी की राहें डाबरग्राम के पैतृक माहाता निवास की ओर मुड़ जाती हैं। परिवार के बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी के बच्चे तक, सभी इस चार दिवसीय महापर्व में पूरे उत्साह से शामिल होते हैं। पूजा के दिनों में रिश्तेदारों की चहल-पहल और आत्मीय हंसी से पूरा घर गूंज उठता है।
इस पूजा की सबसे बड़ी खासियत यहां की अटूट परंपरा है— पूजा के प्रत्येक दिन परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ बैठकर दोपहर का भोजन करना। एक ही छत के नीचे परिवार का यह सामूहिक भोज पारिवारिक एकता, सौहार्द और परस्पर प्रेम का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
वैदिक रीति-रिवाजों और पूर्ण निष्ठा के साथ पुष्पांजलि, आरती, ढाक की पारंपरिक थाप और धुनुची नृत्य से पूरा पूजा मंडप भक्तिमय बना रहता है। डाबरग्राम के माहाता परिवार की यह दुर्गापूजा केवल एक पारिवारिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी भाईचारे, सद्भाव और प्रेम का एक अनूठा संगम है।
आधुनिकता और भागदौड़ भरी इस जिंदगी में भी अपनी समृद्ध संस्कृति, परंपरा और पारिवारिक मूल्यों को संजोए रखते हुए माहाता परिवार इस धरोहर को पूरी श्रद्धा और गरिमा के साथ आगे बढ़ा रहा है।


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