ममता की 'सैंडविच राजनीति' का समय खत्म, अब चुपचाप बैठकर देखें अंजाम: दिलीप घोष



कोलकाता (न्यूटाउन): पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन और बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप घोष ने तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला है। रविवार सुबह न्यूटाउन स्थित इकोपार्क में मीडिया से रूबरू होते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में अब डर और दमन की राजनीति नहीं चलेगी।


"पहले घर उजाड़े, अब परिणाम भुगतें"

ममता बनर्जी द्वारा विपक्ष को सम्मान देने और लोकतांत्रिक मर्यादा की बात करने पर तंज कसते हुए दिलीप घोष ने कहा, "आपने लोगों के घर उजाड़े हैं, कार्यकर्ताओं पर जुल्म किए हैं, इसलिए आज आपको यह दिन देखना पड़ रहा है। ममता बनर्जी की यह 'सैंडविच राजनीति' अब नहीं चलेगी।" उन्होंने आगे कहा कि अब समय आ गया है कि ममता बनर्जी किनारे बैठकर चुपचाप देखें कि आगे क्या होता है। घोष ने दावा किया कि आज उनके साथ उनकी पार्टी के लोग भी नहीं खड़े हैं।


मंत्रालयों के बंटवारे पर बोले घोष

नई सरकार में कार्यभार संभालने के सवाल पर दिलीप घोष ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रिया में थोड़ा समय लगता है। उन्होंने कहा, "अभी केवल शपथ ग्रहण हुआ है। जब तक औपचारिक रूप से विभागों का बंटवारा (पोर्टफोलियो अलॉटमेंट) नहीं हो जाता और चार्ज नहीं मिलता, तब तक काम शुरू नहीं किया जा सकता। अभी कुछ और मंत्रियों का शपथ ग्रहण बाकी है, जिसमें दो-चार दिन लग सकते हैं।" उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी एक काम को प्राथमिकता देने के बजाय सभी अटके हुए कार्यों को एक साथ गति दी जाएगी।


TMC में मची 'भगदड़' पर चुटकी

फिरहाद हकीम द्वारा पार्टी का व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ने की खबरों पर दिलीप घोष ने मजाकिया अंदाज में प्रहार किया। उन्होंने कहा, "भाई, यहाँ तो पूरी सरकार ही हाथ से निकल रही है, ऐसे में व्हाट्सएप ग्रुप छोड़ने की क्या बिसात है? तृणमूल में यह रोज की बात है, कोई आ रहा है तो कोई जा रहा है।"


शोभन देव पर निशाना

शोभन देब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने पर घोष ने कहा कि ममता बनर्जी के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है। उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी है और वे अब केवल किसी न किसी तरह खबरों में बने रहने की कोशिश कर रही हैं।

दिलीप घोष के इन बयानों ने राज्य की सियासत में हलचल तेज कर दी है। उन्होंने अंत में अपनी पार्टी के उन कार्यकर्ताओं की सुध लेने की सलाह दी जो चुनावी हिंसा या अन्य कारणों से घर छोड़ने पर मजबूर हुए थे।

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