जामुड़िया का 'माँ बूढ़ी काली मंदिर': अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में भवानी पाठक ने की थी स्थापना; बामाखेपा व देवी चौधरानी भी कर चुकी हैं पूजा-अर्चना



जामुड़िया- सिंघारण नदी के किनारे स्थित माँ बूढ़ी काली मंदिर का इतिहास लगभग दो सौ वर्ष पुराना है, जो न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय संघर्ष और वीरता का एक गौरवपूर्ण प्रतीक भी है.


अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का केंद्र

किंवदंतियों के अनुसार, जब देश पर अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था, तब क्रांतिकारी भवानी पाठक ने उनके शासन के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका था. इसी दौर में, उन्होंने माँ काली की आराधना और शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से सिंघारण काली मंदिर की स्थापना की थी.


बताया जाता है कि भवानी पाठक प्रतिदिन माता काली की पूजा कर पाठा (बकरा) की बलि चढ़ाते थे और उसके बाद अंग्रेजों के धन को लूटकर गरीबों में बाँट देते थे. उनका यह कार्य अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जन-आंदोलन का प्रतीक बन गया था.


भूगर्भीय आग का चमत्कार

स्थानीय कथाओं के अनुसार, जब भवानी पाठक ने मंदिर की स्थापना की, तभी अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में कोयला खनन शुरू करने की योजना बनाई. स्थानीय लोगों के विरोध को अनसुना कर खनन कार्य प्रारंभ कर दिया गया.


लेकिन, कुछ समय बाद रहस्यमय ढंग से मंदिर के आसपास के क्षेत्र में भूगर्भीय आग लग गई. आश्चर्यजनक रूप से, केवल मंदिर की परिधि को छोड़कर बाकी पूरा क्षेत्र जल उठा. इस चमत्कारी घटना से अंग्रेज भयभीत हो गए और उन्होंने तुरंत खनन कार्य रोक दिया.कार्य बंद होते ही आग अपने आप बुझ गई और मंदिर के चारों ओर पुनः हरियाली फैल गई.


बामाखेपा और देवी चौधरानी का संबंध

इस चमत्कारी घटना की चर्चा दूर-दूर तक फैली. कहा जाता है कि माँ काली के परम भक्त बामाखेपा जब तारापीठ की यात्रा पर थे, तब वह चाकदोला से पैदल चलकर सिंघारण काली मंदिर पहुँचे और माता की आराधना की.


इसी प्रकार, जब देवी चौधरानी को माँ काली के इस जागृत स्वरूप की जानकारी मिली, तब वह भी नियमित रूप से यहाँ पूजा-अर्चना करने आने लगीं.


स्थानीय पुजारी के अनुसार, मंदिर की स्थापना लगभग दो सौ वर्ष पूर्व हुई थी.तब से लेकर आज तक गाँववासी पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ यहाँ काली पूजा करते आ रहे हैं. यह मंदिर अतीत के संघर्ष, चमत्कार और गहन आस्था की कहानी कहता है.

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