परंपरा और सामाजिक सौहार्द की अनूठी मिसाल, सीमा पार बांग्लादेश से भी पहुंचते हैं श्रद्धालु
बसीरहाट/उत्तर 24 परगना- भारत-बांग्लादेश सीमा पर बसे नलकोड़ा गांव में कर परिवार की 269 वर्ष पुरानी दुर्गा पूजा आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं और धार्मिक आस्था के साथ जारी है। उत्तर 24 परगना जिले के बसीरहाट उपमंडल अंतर्गत बसीरहाट नगरपालिका के वार्ड नंबर 2 में आयोजित होने वाली इस पूजा को देखने के लिए सीमा पार बांग्लादेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कर परिवार की इस ऐतिहासिक पूजा की शुरुआत राखालदास कर और ठाकुरदास कर ने की थी। समय के साथ पूजा के स्वरूप और सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आया, लेकिन परिवार ने सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी संभालकर रखा है। कभी पूजा के दौरान झाड़-फानूस और जात्रा-थिएटर आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे, लेकिन अब ये परंपराएं बीते दौर की याद बन चुकी हैं।
वंश परंपरा के अनुसार, कोलकाता के कुमारटुली से मूर्तिकार आज भी यहां पहुंचकर देवी दुर्गा की प्रतिमा तैयार करते हैं। प्रतिमा को पारंपरिक 'डाकेर साज' और चांदी के आभूषणों से सजाया जाता है। पूजा से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा गंगाजल की है। पहले कोलकाता के बाबूघाट से इछामती नदी के रास्ते मिट्टी के मटकों में गंगाजल लाया जाता था। अब गंगाजल वाहनों से लाया जाता है। वर्ष में एक बार लाया गया यही पवित्र जल पूरे साल ठाकुर दालान में मां की पूजा-अर्चना में इस्तेमाल होता है।
बताया जाता है कि स्वप्नादेश के बाद तालाब से प्राप्त नारायण शिला की भी वर्ष भर दोनों समय नियमित पूजा होती है। दुर्गापूजा के अवसर पर देश-विदेश में रहने वाले कर परिवार के सदस्य अपने पैतृक घर लौटते हैं। एकादशी से द्वादशी तक सभी धर्मों और वर्गों के लोगों के लिए विशेष महाप्रसाद की व्यवस्था रहती है। सिंदूर खेला के दौरान भी सभी समुदायों के लोगों का अनूठा मेलजोल देखने को मिलता है।
पूजा के समापन पर पुरानी परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की प्रतिमा को पालकी (चतुर्दोला) पर कंधों के सहारे उठाकर इछामती नदी में विसर्जित किया जाता है। इस तरह कर परिवार की यह पूजा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक विरासत की मिसाल बनी हुई है।

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