आसनसोल – जहां दुर्गा पूजा की पहचान ढाक की गूंज से होती है, वहीं पश्चिम बंगाल के आसनसोल स्थित बर्नपुर इलाके का धेनुआ गांव इस वर्ष एक अनूठी कहानी लिख रहा है। यह कहानी है नारी शक्ति और पारिवारिक एकता की, जिसे ढोल की थाप पर बुना गया है।
आम धारणा है कि ढाक जैसे भारी वाद्य यंत्र को बजाना केवल पुरुषों का काम है, लेकिन धेनुआ गांव के एक संयुक्त परिवार की 17 महिला कलाकारों की टोली इस मिथक को तोड़ते हुए आकर्षण का केंद्र बन गई है। ये महिलाएं एक-दो नहीं, बल्कि एक साथ तीन-तीन ढाक तक बजाकर देखने वालों को अचंभित कर रही हैं।
परिवार की प्रेरणा से बनी 'माँ काली महिला ढाकी दल'
इस असाधारण प्रदर्शन के पीछे की प्रेरणा और प्रशिक्षण परिवार के सदस्यों से ही मिली है। परिवार के काका-श्वसुर, पिसी-श्वसुरियों और श्वासुरियों (मासी, काका-सास और अन्य रिश्तेदार) की सीख और प्रोत्साहन ने इस सपने को साकार किया है।
इस टोली में शामिल हैं— शोभा, शिवानी, माम्पी, तनु, ऋणा, और काजल जैसी 20 से 40 वर्ष की महिलाएं। इनमें जेठानी, ननदें, बहुएं और सासें शामिल हैं, जो रिश्ते में बंधी होने के साथ-साथ ताल और लय में भी एक अटूट बंधन पेश करती हैं। ये सभी मिलकर कालीकृष्ण आश्रम में हर शाम अभ्यास करती हैं।
इस टोली का नाम है "माँ काली महिला ढाकी दल", जो गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर उभरा है। यह दल अब न केवल परिवार के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए नारीशक्ति का प्रतीक बन गया है।
दुर्गा पूजा से लेकर राजनीतिक मंच तक गूंज
इस महिला ढाकी दल की ख्याति अब सिर्फ दुर्गा पूजा तक सीमित नहीं है। उन्हें मनसा पूजा, गणेश पूजा, विश्वकर्मा पूजा और यहां तक कि राजनीतिक कार्यक्रमों में भी प्रदर्शन के लिए विशेष रूप से बुलाया जाता है।
इनके मंत्रमुग्ध कर देने वाले प्रदर्शन को न सिर्फ बंगाल के बांकुड़ा, पुरुलिया, बर्धमान में सराहा गया है, बल्कि पड़ोसी राज्य झारखंड के धनबाद और देवघर तक इनकी मांग है।
इस वर्ष की दुर्गा पूजा के लिए इन्हें कुमारपुर, चलबलपुर, जमताड़ा और धनबाद की पूजा समितियों से विशेष निमंत्रण मिला है। वे खासकर नवपत्रिका जुलूस और विसर्जन शोभायात्राओं में ढाक बजाकर उत्सव का उत्साह दोगुना करेंगी।
बर्नपुर की ये महिला ढाकी कलाकार आज पूरे जिले के लिए गर्व और प्रेरणा की मिसाल हैं, जो दिखाती हैं कि समर्पण, प्रशिक्षण और एकजुटता से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।

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