अंडाल -उखड़ा गोपीनाथ मंदिर से भगवान गोपीनाथ जी पालकी में विराजमान होकर शोभायात्रा के साथ मंदिर प्रांगण से बाहर निकल समस्त नो भगवान भी पालकी में विराजमान होकर बाहर गोस्टो उत्सव में शामिल हुए.
मंदिर के सेवाइत सोहन लाल सिंह हांडा एवं संदीप सिंह हांडा ने बताया कि 150 साल पूर्व यह गोपीनाथजी गोस्टो उत्सव का शुभारंभ हमारे पूर्व पुरुष पुलिन बिहारी लाल सिंह हांडा द्वारा प्रारंभ हुआ था. उन्होंने वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण का गोष्टो उत्सव देख कर आए थे ,वहां के देखने के पूर्व उन्होंने आयोजन उखड़ा गोपीनाथजी मंदिर से प्रारंभ किया .डेढ़ सौ वर्ष से चला आ रहा यह उत्सव पहले गोस्टो जो सर्कस ग्राउंड के समक्ष सभी भगवान वहां उपस्थित होते थे. सभी भगवान सोना के आभूषण एवं चांदी के वस्त्र आदि से लैस रहने के चलते पुलिस द्वारा सिक्योरिटी सही तरीके से नहीं मिल पा रही थी. बोलकर उतना दूर जाने में सुरक्षा का अभाव जान पड़ रहा था जिस कारण से कुछ वर्षों के बाद वहां न होकर गोपीनाथ जी एवं समस्त नो भगवान जिसमें रहे अस्थल स्थान के वृंदावन जी, राय देव के गोपीनाथ जी, कृष्ण बलराम कुल 9 भगवान का पालकी विराजमान चांदनी बाड़ी तक शोभायात्रा के रूप में पहुंचता है सब इकट्ठा होकर वाजपेई मोड़ तक जाते हैं और फिर वापस चांदनी बाड़ी पहुंचकर वहां भक्तों का तांता रहता है, उनका एक झलक पाने के लिए सभी व्याकुल रहते हैं, हरि कीर्तन भजन होता है सभी भगवान का भोग चांदनी बाड़ी में चढ़ता है सभी भगवान एक दूसरे के साथ में मिलते हैं और जाने वक्त गोपीनाथ जी की पालकी के साथ सभी का पालकी को टकराव होता है, जो कि एक परंपरा है और अंत में भगवान भोग प्रसाद के रूप में ग्रहण कर अपने अपने मंदिरों में श्रद्धा पूर्वक शोभायात्रा के साथ मंदिरों में चले जातेहैं यह दृश्य देखने के बाद मालूम पड़ता है कि हम सभी वृंदावन पहुंच गए हैं. एक अनोखा अनुभव भक्तों में देखा जाता है.

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