रानीगंज--वैसे तो अमावस्या और पूर्णिमा का चक्र पूरे सालभर ही चलता रहता है, लेकिन उसमें भी आश्विन पूर्णिमा का खास महत्व है. जिसे कोजागिरी, आश्विन पूर्णिमा, कौमुदी पूर्णिमा या शरद पूर्णिमा भी कहते हैं. आसमान में चमकने वाला चांद तो वही होता है लेकिन इस दिन चांद की खूबसूरती नजर लगने जितने निखार पर होती है. दरअसल इस दिन का महत्व श्रीलक्ष्मी माता से जुड़ा है.पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के बाद बंगाली वर्ग बड़े धूमधाम के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करता है,और इसीलिए बाजारों में पहले से ही मूर्ति की बिक्री शुरू हो जाती है, लेकिन पिछले 2 दिनों से हो रही बारिश ने इस बार बाजार की चमक कुछ फीकी कर दी है. सामान लेने के लिए लोग दशकर्मा भंडार में आ तो रहे हैं, लेकिन भीड़ काफी कम हो रही है. छोटे मूर्तियों के दाम ₹50 से लेकर 400 जबकि बड़ी मूर्तियां 4500 से लेकर 5000तक की बेची जा रही है. ऐसा माना जाता है कि कार्तिक अमावस्या की रात दीपक जलाकर श्रीमहालक्ष्मी का पूजन किया जाता है, तो आश्विन पूर्णिमा की चांदनी में श्रीलक्ष्मी की मनोभाव से पूजा कर उनके आशीर्वाद ओर कृपा लाभ की आशा से रात में जागरण किया जाता है. इस रात्रि में तंत्र-मंत्र साधना करने वाले श्रीसिद्धिदात्री को भी प्रसन्न करने के लिए विशेष पूजा-पाठ करते हैं.

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