आसनसोल : आज देश भर में करवाचौथ की धूम है। भारत के सुहागिन औरतों का यह मुख्य त्योहार है। करवाचौथ पर सुहागिन महिलाएं अपनी पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। करवाचौथ के इस व्रत को करक चतुर्थी, दशरथ चतुर्थी, संकष्टि चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन करवा माता के साथ मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की पूजा करने का भी विधान है। इस दिन सुहागिन स्त्रियों को इस व्रत का वर्ष भर इंतजार रहता है। इस दिन सुहाग से जुड़ी चीजों का काफी महत्व होता है इसलिए सुहागिन स्त्रियां करवा चौथ पर सोलह श्रृंगार करती हैं। पूजा और करवा चौथ व्रत की कथा सुनने के बाद रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत व्रत का पारण करती हैं। अपने पति की समृद्धि और लंबी आयु की कामना करते हुए आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। करवा चौथ का त्यौहार मुख्य रूप से उत्तर भारत की महिलाएं बनाती है शिल्पांचल में भी महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखें तथा विधि विधान से पूजा अर्चना की। 8:12 पर चंद्रोदय के वक्त महिलाएं चलनी में चांद देखने के बाद पति का चेहरा देखें एवं पति के हाथ से अपना व्रत तोड़ा।
इस दौरान शिल्पांचल की महिलाएं दुल्हन के रूप में सच कर ने घरों के छतों पर दिखाई दी कई महिलाएं विभिन्न मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना की।
इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने के बाद मंदिर की साफ-सफाई कीं। इसके बाद पूजा करते समय व्रत प्रारंभ कर ।‘‘मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये कर्क चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये’ मंत्र का जाप करते हुए व्रत का संकल्प लीं। इसके बाद पूजन के स्थान पर गेहूं से फलक बना कर और उसके बाद चावल पीस कर करवा की तस्वीर बनाईं। इसके उपरांत आठ पूरियों कि अठवारी बनाकर उसके साथ हलवा या खीर बनाकर पक्का भोजन तैयार की। इसके पश्चात पीले रंग की मिट्टी से गौरी कि मूर्ति का निर्माण कर उनकी गोदे में गणेश जी को विराजित कराई एवं मां गौरी को चौकी पर स्थापित कर लाल रंग कि चुनरी ओढ़ा कर उन्हें शृंगार का सामान अर्पित कीं। इसके बाद विधिपूर्वक गणेश गौरी की विधि पूर्वक पूजा कर करवाचौथ की कथा सुनीं। पूजा करने के उपरांत चंद्रमा निकलते ही चंद्र दर्शन के उपरांत पति को छलनी से देखकर पति के हाथों से पानी पीकर अपने व्रत का उद्यापन कीं।

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