रानीगंज: रानीगंज विधानसभा क्षेत्र के तिराट गांव में सदियों पुरानी परंपरा और आस्था का संगम देखने को मिला. यहाँ लगभग 800 साल पुराने ऐतिहासिक 'श्री श्री धर्मराज गाजन उत्सव' की शुरुआत पूरे विधि-विधान के साथ हुई. इस उत्सव को देखने और भगवान शिव की कठिन तपस्या में शामिल होने के लिए पूरे पश्चिम बर्धमान जिले से भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ पड़े.
कठिन तप और प्राचीन परंपराएं
गाजन उत्सव को बंगाल की संस्कृति में भगवान शिव की आराधना का सबसे कठिन स्वरूप माना जाता है. तिराट गांव में परंपरा के अनुसार सुबह धर्म पुराण के पाठ के बाद शाम को श्रद्धालुओं ने अपने शरीर में तीर चुभाकर (तीर भेदन) शोभायात्रा निकाली. अपनी मन्नतें पूरी होने पर कई श्रद्धालु तपती गर्मी में मंदिर तक दंडवत (साष्टांग प्रणाम) करते हुए पहुँचे. मान्यताओं के अनुसार, यह कठिन तपस्या भगवान शिव के प्रति आभार प्रकट करने का एक माध्यम है.
सामाजिक संदेश: प्लास्टिक और मोबाइल से दूरी
इस वर्ष का उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके जरिए समाज को जागरूक करने का प्रयास भी किया गया. उत्सव के दौरान आयोजित 'गो एज यू लाइक' प्रतियोगिता के माध्यम से दो महत्वपूर्ण संदेश दिए गए,जिनमे पर्यावरण संरक्षण के तहत प्लास्टिक के बढ़ते कचरे को कम करने और जूट या डोरी के उपयोग को बढ़ावा देना.बाल सुधार के तहत बच्चों को मोबाइल की लत से दूर रखने के प्रति अभिभावकों को जागरूक करना.
उत्सव की रात को यादगार बनाने के लिए कोलकाता ओपेरा द्वारा प्रसिद्ध जात्रा (लोक नाटक) का मंचन किया गया. ग्रामीण बंगाल की इस लुप्त होती जात्रा कला को देखने के लिए देर रात तक दर्शकों की भारी भीड़ जमी रही.
बढ़ता आकर्षण: क्षेत्रीय से जिला स्तरीय पहचान
कभी केवल तिराट गांव और आसपास के इलाकों तक सीमित रहने वाला यह गाजन उत्सव अब अपनी भव्यता के कारण पूरे जिले में प्रसिद्ध हो चुका है. ग्रामीणों का कहना है कि 800 वर्षों से यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है, जो आज भी अपनी मूल सादगी और कठिन नियमों के साथ जीवित है.आयोजन समिति के सदस्य ने कहा कि यह सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारी विरासत है. गर्मी के इस मौसम में भगवान शिव की आराधना कर हम लोक-कल्याण की कामना करते हैं.



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