रानीगंज- पौष माह के शुभ अवसर पर रानीगंज के गडेरी समाज के वन देवता भूखन मल की वार्षिक पूजा अर्चना बरदही अंचल में पारम्परिक हर्षोल्लास के साथ 'बन देवता' (भुखन बाबा) की पूजा और वनभोज मिलन समारोह संपन्न हुआ.इस आयोजन में मेष पालक (भगत/गड़ेरी) समुदाय के लोगों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लेकर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नमन किया.
आस्था और परंपरा का संगम
रविवार को आयोजित इस पूजा में मुख्य रूप से भूखनमल बाबा, सेवक राम बाबा और मधुचक बाबा की आराधना की गई. मान्यता है कि बाबा वर्ष भर पशुधन और पशुपालकों की प्राकृतिक आपदाओं व संकटों से रक्षा करते हैं. राजस्थान के चूरू जिले (आदिसर गांव) से जुड़ी इस परंपरा को रानीगंज के मेष पालक पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं.समाज के जिलाध्यक्ष उत्तम भगत ने बताया कि रानी अहिल्याबाई होलकर और चंद्रगुप्त मौर्य हमारे पूर्वज हैं .गड़ेरिया, बघेल, धनगर और राजस्थान के गुज्जर समाज का मूल पेशा मेष पालन रहा है.
आसनसोल नगर निगम में मेयर परिषद सदस्य दिव्येंदु भगत ने कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होकर उन्होंने सामुदायिक एकजुटता पर बल दिया.उन्होंने कहा कि यह परंपरा जन्म-जन्मांतर से चली आ रही है और आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है.बबलू भगत ने उन्होंने मंदिर के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 1994 तक यह मंदिर बसरा मोड़ के पास था, जिसे सड़क निर्माण के दौरान वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया गया.गोवर्धन भगत ने कहा पूर्वजों के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि बाबा की कृपा से ही जंगलों में सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा के दौरान भी कभी किसी पशुपालक की जान नहीं गई. उन्होंने कहा कि यह परंपरा जन्म-जन्मांतर से चली आ रही है और आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है.अजीत कुमार भगत (पूर्व सैनिक) ने चिंता व्यक्त की कि आधुनिकता और सेना/अन्य पेशों में जाने के कारण युवा वर्ग बुनकर और कंबल बनाने जैसे पारंपरिक कार्यों से दूर होता जा रहा है.
सांस्कृतिक महत्व
मेष पालक समुदाय के लिए भूखनमल बाबा एक महान आध्यात्मिक पथप्रदर्शक हैं. इस अवसर पर मेष बलि देकर प्रसाद ग्रहण किया गया. यद्यपि समय के साथ लोगों ने अन्य व्यवसायों को अपना लिया है, लेकिन इस तरह के आयोजन बिखरे हुए समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं.
आयोजन में समाज के लगभग 150 सौ से अधिक लोग एकत्रित हो कर इस वनदेवता के पूजा में शामिल हुए.


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