बांकुडा- बांकुड़ा के जयारामबाटी स्थित मातृमंदिर से, जहाँ माँ सारदा देवी के पावन जन्मस्थान पर आज अष्टमी पूजा के साथ-साथ कुमारी पूजा की गई। पूरे मंदिर परिसर में श्रद्धा और उत्साह का ऐसा माहौल है कि हर कोई माँ के दर्शन और आशीर्वाद के लिए आतुर दिखा
शक्ति की उपासना का महापर्व—दुर्गा पूजा। और इस पावन पर्व पर, जयारामबाटी का मातृमंदिर एक बार फिर आस्था का केंद्र बन गया है।
परंपरा के अनुसार, आज यहाँ विशुद्ध निर्णय पंचिका की तिथि मानकर सुबह ठीक 9 बजे कुमारी पूजा आरंभ हुई। देशभर से आए हज़ारों भक्तों का सैलाब इस पवित्र भूमि पर उमड़ पड़ा है, जो माँ सारदा के पावन आशीर्वाद को पाना चाहता है।
माँ सारदा, जिन्हें श्रीरामकृष्ण परमहंस ने स्वयं जगतजननी और शक्ति रूपा के रूप में पूजा था, और जिन्हें स्वामी विवेकानंद ने "साक्षात दुर्गा" कहकर संबोधित किया था—उनका संदेश था, "सभी का मंगल हो।" उनका मातृत्व स्नेह आज भी यहाँ की हवाओं में महसूस किया जा रहा है.
जयारामबाटी में दुर्गा पूजा की एक गौरवशाली परंपरा है. यह उत्सव 1925 में शुरू हुआ था, जब पहले चित्रपट पर पूजा होती थी. लेकिन सात साल बाद, प्रतिमा निर्माण कर इस उत्सव को एक भव्य रूप दिया गया। तब से हर वर्ष, पंचांग और परंपरा के अनुसार, मातृमंदिर में यह दुर्गा पूजा संपन्न होती है.
कुमारी पूजा का विशेष अनुष्ठान:
इस वर्ष, कुमारी रूप में निशिका बंद्योपाध्याय की पूजा की गई. परंपरा के अनुसार, इस कुमारी को माँ सारदा के पुराने घर से देवी रूप में सुसज्जित कर मातृमंदिर तक लाया गया.
यह पावन अवसर केवल पूजा का नहीं है, बल्कि माँ सारदा के मातृत्व भाव और उनके सार्वभौमिक संदेश को पुनः स्मरण करने का भी है. जयारामबाटी एक बार फिर हमें याद दिला रहा है कि नारी शक्ति ही सर्वोच्च शक्ति है.

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