प्रख्यात बंगाली साहित्यकार प्रफुल्ल रॉय का निधन, उनकी रचना में दिखा देश विभाजन का दर्द




कोलकाता (पीबी टीवी ) :  बांग्ला साहित्य के विद्वान प्रफुल्ल रॉय का निधन हो  गया । वे लंबे समय से बुढ़ापे से जुड़ी बीमारी से पीड़ित थे। पिछले कुछ महीनों से उनका दक्षिण कोलकाता के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था। गुरुवार दोपहर 3:15 बजे उन्होंने उसी अस्पताल में अंतिम सांस ली। निधन के समय उनकी उम्र 90 वर्ष थी। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। हालांकि, पिछले कुछ महीनों में उनकी शारीरिक स्थिति खराब हो गई थी। उनकी सांस फूलने लगी थी। जब स्थिति लगातार गंभीर होती गई, तो उनके रिश्तेदारों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने का फैसला किया। वहीं उनका निधन हो गया। बांग्ला  साहित्य की दुनिया में प्रफुल्ल का योगदान निर्विवाद है। उन्होंने केया पातर नौका, मोंड मेयार उपाख्यान, नोना जल मिठे माटी जैसे उपन्यासों से पाठकों को रूबरू कराया। बाद में उनकी कहानी 'केया पातर नौका' पर आधारित बंगाली धारावाहिक ने विशेष लोकप्रियता हासिल की। उन्हें उपन्यास आकाशेर नेई मानुष के लिए बंकिम पुरस्कार मिला। उन्हें साहित्य अकादमी के लिए भी नामित किया गया था। इसके अलावा प्रफुल्ल ने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में अनगिनत छोटी-छोटी कहानियां भी लिखी हैं। जिन्होंने अलग-अलग समय पर पाठकों के दिलों को छुआ है। प्रफुल्ल का जन्म 1934 में अविभाजित बंगाल के ढाका में हुआ था। विभाजन के बाद वे 1950 में भारत आ गए। तब से वे कोलकाता में रह रहे हैं। विभाजन का दर्द और शरणार्थियों की बातें उनकी रचनाओं में समाहित हैं। उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर एक के बाद एक किताबों में उस दर्द को बयां किया है। उन्होंने नागालैंड में भी कई दिन बिताए। वहीं से 1956 में उनका पहला उपन्यास 'पूर्वा पार्वती' प्रकाशित हुआ। उनकी कहानियों और उपन्यासों को मिलाकर 150 से अधिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। गुरुवार को उनके निधन पर बंगाल का साहित्यिक समुदाय शोक में है।

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