टीडीबी कॉलेज हिंदी विभाग की ओर से एक विशिष्ठ व्याख्यान का आयोजन किया गया



व्याख्यान में उपस्थित श्री रणेन्द्र एवं कॉलेज के प्रोफेसर


रानीगंज-टीडीबी कॉलेज, रानीगंज के हिंदी विभाग की ओर से एक विशिष्ठ व्याख्यान का आयोजन किया गया. जिसका विषय था – ‘आदिवासी साहित्य और इतिहास’.कार्यक्रम की शुरूआत वरिष्ठ कथाकार आदरणीय श्री रणेन्द्र को कॉलेज के सिनियर जीबी मेम्बर डॉ. अमिताभ नायक ने साल और पौधा देकर सम्मानित किया. हिंदी विभाग के पीजी कॉडिनेटर डॉ. जयराम कुमार पासवान ने मुख्य वक्ता आदरणीय श्री रणेन्द्र को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया.हिंदी विभाग के सहयोगी डॉ. गणेश रजक सर ने जीबी मेम्बर डॉ. अमिताभ नायक को उत्तरीय भेंट देकर सम्मनित किया. यूजी कॉडिनेटर डॉ. वसीम आलम ने जीबी मेम्बर डॉ. अमिताभ नायक को पौधा भेंट किया.ज्ञात हो कि श्री रणेन्द्र आदिवासी जीवन, समाज, सस्कृति और अस्मिता के प्रतिनिधि कथाकार है. उनके तीनों उपन्यासों में उनकी दृष्टि और विचार सम्पन्ता लक्षित की जा सकती है. ‘ग्लोबल गांव के देवता’ में वरिष्ठ कथाकार श्री रणेन्द्र ने असूर समुदाय के जरिये एक सभ्यतामूलक विमर्श खड़ा करते है. ‘ग्लोबल गांव के देवता’ यह उपन्यास काज़ी नजरूल विश्वविद्यालय के यूजी चतुर्थ सेमेस्टर के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है यह उनका बहुत ही लोक प्रिय उपन्यास है.वर्ष 2020 में ‘ग्लोबल गांव के देवता’ के लिए वरिष्ठ कथाकार रणेन्द्र को ‘श्रीलाल शुक्ल’ सम्मान से भी सम्मानित किया गया. हिंदी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका डॉ. मंजुला शर्मा ने मुख्य वक्ता वरिष्ठ कथाकार रणेन्द्र का संक्षिप्त परिचय दिया. मुख्य वक्ता कथाकार रणेन्द्र सर ने ‘आदिवासी साहित्य और इतिहास’ विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि जब मेरी पहली पोस्टिंग प्रशासानिक आधिकारी के रूप में 1988 में बिहार के रोहतास में हुई तो वह वहां की जाति व्यवस्था को देखकर काफी आहत हुये.ऊँच-नीच, कमजोर- सबल, जमींदार वर्ग के लोग ही सम्मान व आदर पाते थे. जब उन्होंने इस में बुनियादी सुधार लाने की कोशिश किये तो उनके कई तरह के दिक्कतें का समाना भी करना पड़ा. कथाकार रणेन्द्र रामदयाल मुड़ा जी को याद करते हुए अपने वक्त्व्य में कहते है कि उनका व्यक्तिव और कृतित्व्य ने उन्हें काफी प्रभावित किया था.रामदयाल मुंडा जी ने जनजातिय भाषा के विकास के लिए औऱ मुंडारी से हिंदी में जो अनुवाद किया था यह सभी कार्य को देखकर उनके मन में एक भव्य छवि बन गया था. र कथाकार रणेन्द्र ने अपने वक्त्व्य में महाश्वेता देवी के संधर्षों को बार-बार याद किया.उन्होंने कहा महाश्वेता देवी के कारण वे आदिवासी समुदायों और जनजातियों लोगों के बारे में जान पाएं और साहित्य की ओर अग्रसर हो पाये.महाश्वेता देवी ने पुरूलिया के सबर लोगों के उत्थान के लिए जो काम किया किया वही उनकी प्रेरणा का केन्द्र बनी. उन्होंने अपने उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ को ध्यान में रखते हुए अपना वक्त्वय दिया और कहा कि असुर जनजाति को लेकर जो लोगों के मन में धारणाएं थी कि उनके दस- बीस हाथ होते हैं, लंबे- लंबे दाँत है, वास्तव में उन्हें समाज से दूर रखने और उन्हें हीन- दृष्टि से देखने के लिए था. किंतु वास्तविकता यह है कि उन्होंने ने ही सबसे पहले आग और धातु की खोज करने वाली समुदाय थी.धातु पिघलाकर आकार देने वाली कारीगर असुर समुदाय से था, पर हमारी सोची समझी साजिश ने उसे इतिहास से दूर रखा. कथाकार रणेन्द्र ने अपने वक्त्व्य में कथाकार संजीव को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनका प्रभाव उनके जीवन पर बहुत पड़ा. कथाकार संजीव के साहित्य व लेखन से वे काफी प्रभावित थे.धार, जंगल जहाँ से शुरू होती है, सावधान नीचे आग है और पांव तले की दूब है. इन रचनाओं में आदिवासी, मेहनतकश लोगों के अभावग्रस्त जिंदगी के दुख को हम हम सब के समक्ष उजागर किया, जिनके कारण उन्हें उस समाज की व्यवस्था, संस्कृति, रहन- सहन के बारे में पता चला जो उनके मन में उन वंचित लोगों के प्रति कोलाहल उत्पन्न की.   




 मंच का संचालन पीजी कॉडिनेटर डॉ. जयराम कुमार पासवान ने किया. अंत में यूजी कॉडिनेटर डॉ. वसीम आलम ने धन्यवाद ज्ञापित किया. इस अवसर पर हिंदी विभाग से डॉ. आलम शेख, डॉ. मीना कुमारी, डॉ. किरण लता दूबे, रीना तिवारी शिल्पांचल के बहुचर्चित कथाकर शिव कुमार यादव, रानीगंज के समाजसेवी व साहित्यकार संजय सुमति, काज़ी नजरूल विश्वविद्यालय के असिटेंट प्रोफेसर एवं सुपरचित लोकप्रिय कवि डॉ. विजय कुमार साव (निशांत), जीबी मेम्बर व उर्दू विभाग के कॉडिनेटर डॉ. सफक्त कमाल, उर्दू विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका डॉ. सबेरा हेना खातून, इतिहास विभाग के अजहर इस्लाम, फिजिक्स विभाग से पार्सल किस्कू सहित बड़ी संख्या में छात्र और शोधार्थी उपस्थित रहें.

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