रानीगंज- स्वतंत्रता संग्राम के नायक शहीद सिद्धु, कानू ,चांद भैरब की याद में राज्य भर के आदिवासियों ने विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये. जल, जमीन और जंगल के अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन को मजबूत करने का आह्वान करते हुए आदिवासियों ने रानीगंज के बाँसड़ा स्तिथ एस टी डी क्लब की और से सिधु कानू की मूर्ति पर मलयदान कर आदिवासी परम्परागत हथियार लेकर इलाके की परिक्रमा किया.इस अवसर पर संजय हेम्ब्रम,मंगल हेम्ब्रम,दसरथ कोड़ा सहीत काफी संख्या में आदिवासी महिला पुरुष शामिल थे.वहीं नूपुर, तीराट , चेलोद क्षेत्रों में भी पदयात्रा निकाली गई.संजय हेम्ब्रम ने कहा कि 1855 में आदिवासियों ने तत्कालीन ब्रिटिश शासकों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी.उस विद्रोह के नायक सिधू कानू शहीद हो गये थे .इससे आदिवासी समुदायों में अंग्रेजों के खिलाफ तीव्र नफरत और गुस्सा फैल गया और स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गया था. आदिवासियों की मुख्य मांग थी कि उन्हें जल, जमीन और जंगल के अधिकार से वंचित न किया जाये. 169 साल बाद भी आदिवासी जल, जमीन और जंगल पर अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं.शुक्रवार को आदिवासियों ने सिद्धु कानू को प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी का दर्जा देने की मांग को लेकर धमसा मदल तीर-धनुष के साथ मार्च किया . अलचिकि भाषा में पढ़ाई की व्यवस्था होनी चाहिए और आदिवासियों के लिए अलग स्कूल खोले जाने चाहिए. अखिल भारतीय किसान संघ द्वारा भी हुल दिवस मनाया गया. किसान नेताओं का कहना है कि मौजूदा सरकार उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर रही है. हुल दिवस धमसा मदल के साथ खुशी मनाने का दिन नहीं है, यह हमारे अधिकारों की रक्षा के लिए शपथ लेने का दिन है.

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