तमलुक (पश्चिम बंगाल):
पश्चिम बंगाल के तमलुक शहर की आराध्य देवी मां वर्गभीमा हैं। तमलुक के निवासी किसी भी शुभ काम या पूजा से पहले मां वर्गभीमा की पूजा करते हैं। यहाँ हज़ारों सालों से माँ दुर्गा और काली के रूप में देवी वर्गभीमा की पूजा होती आ रही है।
यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ देवी सती की बाईं एड़ी गिरी थी।
मंदिर की अनोखी परंपराएं
पूजा की अनुमति: तमलुक क्षेत्र में कोई भी शक्ति पूजा (जैसे काली पूजा) करने से पहले आज भी सबसे पहले मां वर्गभीमा से अनुमति ली जाती है।
शोल मछली का भोग: मां वर्गभीमा को रोज़ अन्न भोग के साथ 'शोल मछली' का झोल चढ़ाया जाता है। भक्त भी अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए माँ को शोल मछली, ताल, ओल और अरबी (कचू) चढ़ाते हैं।
राजा ताम्रध्वज की कथा: महाभारत के अनुसार, तमलुक के राजा ताम्रध्वज ने इस मंदिर की स्थापना की थी। एक गरीब मछुआरी जंगल के एक कुएं के पानी से मरी हुई शोल मछली को जिंदा कर देती थी। जब राजा ने यह चमत्कार देखा, तो उन्हें वहां देवी की मूर्ति मिली और उन्होंने मंदिर बनवाया।
काली पूजा के दिन माँ को राजा के वेश में सजाया जाता है और यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है। सभी धर्मों के लोग माँ के दर्शन करने आते हैं।

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