आसनसोल : आसनसोल हिंदी अकादमी की ओर से सोमवार को आसनसोल नगर निगम के सभागार में मुंशी प्रेमचंद की 143 वीं जयंती मनाई गई कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में हावड़ा हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर दामोदर मिश्र एवं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर महेंद्र प्रसाद कुशवाहा उपस्थित हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ डीपी बरनवाल ने एवं मंच संचालन सिलपंचल के प्रसिद्ध साहित्यकार सृंजय ने किया। इसके अलावा कार्यक्रम में आसनसोल हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष दिवेन्दु भगत, सचिव भोला कुमार हेला, सह सचिव दिनेश पांडे, डॉ सवेरा खातून, डॉ महावीर रागी आदि उपस्थित थे। आसनसोल हिंदी अकादमी की ओर से उपस्थित सभी अतिथियों को गुलदस्ता एवं पुष्प गुच्छ देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान सभी अतिथियों ने मुंशी प्रेमचंद की जीवनी उनके साहित्य तथा उस समय के समाज की बुराइयों पर अपनी लेखनी के माध्यम से किए गए चोट की व्याख्या की। साहित्यकार श्रिंजय ने मुंशी प्रेमचंद को अब तक का हिंदी का सबसे बड़ा साहित्यकार करते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद ने अपने समय में समाज की बुराइयों को उजागर करने के लिए लेखनी का सहारा लिया उन्होंने हर वर्ग के लोगों के लिए उपन्यास तथा कहानियां लिखी बावजूद इसके उनकी आलोचना समय-समय पर होती रही है उनके विषय में आलोचक कहते थे कि वह दलित विरोधी थे अमीर थे इसलिए हुक्का पीते थे तथा अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाते थे उन्होंने कहा कि जिन महापुरुषों ने अपने चरित्र एवं अपनी योग्यता को लेकर अपने आपको समाज में स्थापित किया है उनकी ही आलोचना होती है। महापुरुषों की आलोचना ही उनकी प्रसिद्धि तथा उनकी योग्यता का प्रमाण होती है।
डॉ महेंद्र प्रसाद कुशवाहा ने मुंशी प्रेमचंद को समाज की कुरीतियों सामाजिक बुराइयों पर लेखनी के माध्यम से चोट करने वाला कभी बताया उन्होंने कहा कि अब अपनी विभिन्न उपन्यास एवं कहानियों के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों एवं कुरीतियों को खत्म करने की चेष्टा की।
डॉ दामोदर मिश्र ने कहा कि हिंदी की स्थित दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही है। वर्तमान में सारे भारतवर्ष में 10 राज्यों में ही हिंदी बोली जाती है। हिंदी के इतिहास में मुंशी प्रेमचंद का नाम इतना बड़ा है कि हिंदी भाषी प्रदेशों को छोड़कर गैर हिंदी भाषी प्रदेश में जाकर पूछा जाए कि हिंदी के लेखक किसी को जानते हैं पहला नाम मुंशी प्रेमचंद का ही आएगा और बाद में पौराणिक आध्यात्मिक परंपरा के लोग नाम लेंगे तुलसीदास का। आधुनिक परंपरा में निश्चित रुप से प्रेमचंद का नाम सर्वोपरी आता है। मुंशी प्रेमचंद की बड़ी आलोचना हुई है। मुंशी प्रेमचंद पर कई विरोधी लोग बुरी बुरी टिप्पनियां की हैं। उन टिप्पणियों से आहत होकर रामविलास शर्मा जी को कलम पकड़नी पड़ी थी। उन्होंने कहा है कि प्रेमचंद एवं निराला इन दोनों का विरोध हो उनके पक्ष के लिए मुझे कलम पकड़ना जरूरी हुआ।
कार्यक्रम का सफल आयोजन करने के लिए सभी ने हिंदी अकादमी के सचिव भोला कुमार हेला की तारीफ की।


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