चुनावी रण से हटे पर संघर्ष रहेगा जारी; बोले—"रानीगंज के अस्तित्व और नदियों को बचाने की लड़ाई से पीछे नहीं हटूंगा"
रानीगंज: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच रानीगंज विधानसभा क्षेत्र के जाने-माने समाजसेवी और 'रानीगंज बचाओ मंच' के सक्रिय सदस्य गोपाल आचार्य ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दाखिल अपना नामांकन पत्र वापस ले लिया है. सोमवार को दुर्गापुर एसडीओ कार्यालय में पर्चा भरने के बाद, अचानक लिए गए इस फैसले ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है.ज्ञात रहे को 9 अप्रैल को नामांकन वापस लिए जाने की अंतिम तिथि थी,और आज ही निर्दलीय उम्मीदवारों को एसडीओ कार्यलय से चुनाव चिन्ह प्रदान करना था.
क्यों पीछे हटे गोपाल आचार्य?
नामांकन वापसी की घोषणा करते हुए गोपाल आचार्य ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय उन्होंने अपनी शारीरिक अस्वस्थता के कारण लिया है. उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ने के लिए जिस ऊर्जा और भागदौड़ की आवश्यकता है, उनका स्वास्थ्य फिलहाल उसकी अनुमति नहीं दे रहा है,हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि चुनावी राजनीति से हटने का मतलब जनसेवा से पीछे हटना नहीं है.
किन मुद्दों पर बुलंद की थी आवाज?
नामांकन दाखिल करते समय गोपाल आचार्य ने रानीगंज के ज्वलंत मुद्दों पर "बाहरी विधायकों" और वर्तमान व्यवस्था को जमकर घेरा था. उनके संघर्ष के मुख्य बिंदुओं में रानीगंज के अस्तित्व पर संकट को लेकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि जिस तरह से रानीगंज में ओपन कास्ट माइंस के विस्तार की बात कही जा रही है, उससे पूरा शहर के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रही है.नदियों का दोहन को लेकर कहा कि अजय और दामोदर नदी से मशीनों द्वारा अवैध बालू उत्तोलन पर वह चिंतित है. उन्होंने कहा कि मैनुअल के बजाय मशीनों के उपयोग से नदियों का स्वरूप बिगड़ रहा है और इलाके में जल संकट गहरा गया है. नदियों के किनारों से कोयला निकालने की प्रक्रिया के विरुद्ध उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय में जनहित याचिका भी दायर की है.उन्होंने कहा कि भले ही मैंने अपना नामांकन वापस ले लिया है, लेकिन रानीगंज कोयलांचल और शिल्पांचल के लिए मेरी लड़ाई जारी रहेगी. नदियों को लेकर अदालत में मामला किया गया है और रानीगंज को बचाने का आंदोलन पहले की तरह ही चलता रहेगा. ज्ञात रहे कि रानीगंज के शीतला गली निवासी गोपाल आचार्य क्षेत्र में एक प्रखर वक्ता और आंदोलकारी के रूप में जाने जाते हैं.1990 में टीडीबी कॉलेज से स्नातक करने वाले आचार्य 'सुभाष स्वदेश भावना' के चेयरमैन के रूप में भी सक्रिय हैं.उनका मानना है कि रानीगंज के दर्द को केवल एक स्थानीय व्यक्ति ही समझ सकता है, न कि कोई बाहरी.भले ही गोपाल आचार्य अब चुनावी मैदान में एक प्रत्याशी के रूप में नहीं दिखेंगे, लेकिन उनके समर्थकों का मानना है कि एक समाजसेवी के तौर पर उनकी सक्रियता राजनीतिक दलों के लिए आने वाले समय में चुनौती बनी रहेगी.


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