विशेष रिपोर्ट: विकास की बयार या अधूरे सपनों की गूँज? जानें क्या वाकई मुस्कुरा रहा है जंगलमहल


शालबनी (पश्चिम मेदिनीपुर) पीबी टीवी: एक दौर था जब पश्चिम मेदिनीपुर का शालबनी और पीड़ाकाटा इलाका अशांति, बारूद की गंध और आतंक का पर्याय माना जाता था। लाल मिट्टी वाले इस अंचल की पहचान 'सन्नाटे' से होती थी। लेकिन आज समय का पहिया घूम चुका है। यहाँ की पक्की सड़कें और रात में जलती स्ट्रीट लाइटें गवाही दे रही हैं कि विकास ने दस्तक तो दी है, लेकिन क्या यह विकास हर घर की दहलीज तक पूरी तरह पहुँच पाया है?


आतंक के साये से बाहर निकलता जनजीवन

कभी माओवादी गतिविधियों का केंद्र रहे इस क्षेत्र में अब जनजीवन सामान्य है। 'ग्रामीण सड़क योजना' ने यहाँ की कनेक्टिविटी बदल दी है। स्थानीय निवासी बुद्धेश्वर सबर कहते हैं, "पहले यहाँ कदम रखना मुश्किल था, अब सड़कें पक्की हैं, बिजली है और लगभग हर हाथ में काम तो नहीं, पर सिर पर पक्की छत (पक्का मकान) जरूर है।"


स्वास्थ्य और शिक्षा: सुगम हुई राह

इलाके की बेलावती सबर बताती हैं कि बुनियादी ढांचे में सुधार का सबसे बड़ा फायदा स्वास्थ्य सेवाओं में मिला है। पहले सड़क न होने के कारण मरीजों को अस्पताल ले जाना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन अब एम्बुलेंस सीधे घर के दरवाजे तक पहुँच जाती है। शिक्षा के प्रति भी लोगों का रुझान बढ़ा है।


चमकती सड़कों के पीछे छिपी चुनौतियां

सड़कों और मकानों की चमक के बीच कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जो आज भी प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं:

खेतों तक नहीं पहुँचा पानी: सिंचाई व्यवस्था आज भी पुरानी पद्धति पर निर्भर है। बुद्धेश्वर सबर के अनुसार, खेती को मुनाफे का सौदा बनाने के लिए और अधिक 'सब-मर्सिबल' पंपों की दरकार है।

पाइप तो हैं, पर प्यास बाकी: सुमिता सबर ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा कि नल से जल के कनेक्शन तो मिल गए हैं, लेकिन पानी की आपूर्ति बेहद अनियमित है।

रोजगार का संकट और पलायन: सबसे गंभीर समस्या रोजगार की है। उद्योगों की कमी और स्थानीय स्तर पर काम न मिलने के कारण जंगलमहल के युवा आज भी दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर हैं।


क्या कहते हैं जिम्मेदार?

इलाके के विधायक और राज्य के मंत्री श्रीकांत महतो इन चुनौतियों को विकास की एक प्रक्रिया मानते हैं। उनका दावा है कि, "शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़कों के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया है। आप खुद जाकर देखें, जंगलमहल के लोगों के चेहरों पर अब खौफ नहीं, मुस्कान है।"


निष्कर्ष:

पीड़ाकाटा और शालबनी बदलाव की दहलीज पर खड़े हैं। शांति की बहाली निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन जंगलमहल की इस 'मुस्कान' को स्थायी बनाने के लिए सरकार को रोजगार, सिंचाई और नियमित जलापूर्ति जैसे मोर्चों पर अभी और पसीना बहाना होगा। वरना, चमकती सड़कें खाली पेट और सूने घरों का रास्ता ही दिखाती रहेंगी।

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