नदिया। जिनका ध्यान और ज्ञान बस एक ही नाम पर केंद्रित है—मोहम्मद रफ़ी। रफ़ी साहब के गीत ही उनके जीवन की राह हैं। काम के दौरान भी उनके होठों पर रफ़ी साहब के नग़मे होते हैं। रफ़ी के गीतों के सहारे ही उनका दिन कटता है। ये कहानी है नदिया ज़िले के अरंगघाटा निवासी लॉक मिस्त्री सनातन खान की, जो पिछले 40 वर्षों से यह काम कर रहे हैं। जैसे जीवन में सफलता की चाबी हासिल करना कठिन होता है, वैसे ही चाबी खो जाए तो ताले भी खो जाते हैं। मगर जब अलमारी या संदूक की चाबी खो जाए, तो उसका विकल्प होता है—नई चाबी बनाना या ताले को किसी अन्य उपाय से खोलना। इस पेशे के लोग आजकल बहुत कम मिलते हैं। लेकिन सनातन खान इस कला के माहिर हैं। उनकी कला केवल रानाघाट में ही सीमित नहीं है, बल्कि वे विभिन्न जगहों पर जाकर लॉक खोलते हैं, ताले बनाते हैं। और इस पूरे काम में उन्हें ताकत मिलती है मोहम्मद रफ़ी के गीतों से। वह रफ़ी के गीत सुनते हुए, गुनगुनाते हुए, चाबियाँ बनाते हैं, खोए हुए ताले खोलते हैं। नेताजी, सुकांत, रवींद्रनाथ की तस्वीरों के सामने वे काम करते हैं, और साथी होता है—रफ़ी साहब का संगीत। फुटपाथ पर उनका अस्थायी दुकान रानाघाट, यहां तक कि कोलकाता तक में भी लोगों की जरूरत बन गया है। जब कहीं अलमारी या तिजोरी का ताला अटक जाए या चाबी खो जाए, लोग उन्हें बुलाते हैं। और वे जैसे ही रफ़ी साहब के गीत सुनते हैं या गुनगुनाते हैं, मानो चमत्कार हो जाता है—बंद ताले खुल जाते हैं। उनके पास एक छोटा सा औज़ारों का बक्सा है, जिसमें रफ़ी साहब के पुराने गीतों की धुनें भी बसी हैं। राह चलते लोग उनके गीत सुनकर रुक जाते हैं, पुरानी यादों में खो जाते हैं। "ना तू ज़मीं के लिए है..." या "बहारों फूल बरसाओ..." जैसे गीतों के साथ वे अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।

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