रांनीगंज-शरद पूर्णिमा के अवसर पर बंगाली समाज लक्खी पूजा या (लक्ष्मी पूजा) का आयोजन करते है. बंगाली समाज में लक्ष्मी पूजा के दिन घर को सजाने एवं शाम को दीप प्रज्वलित कर माता लक्ष्मी की पूजा करने का रिवाज है. पूर्वी भारत में शरद पूर्णिमा पर महालक्ष्मी की पूजा कर खीर बनाई जाती है . इसके बाद खीर को घर के बाहर कुछ इस तरह से रखा जाता है जिससे चंद्रमा की रोशनी सीधे खीर पर पड़े.माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन ही मां लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी. इसलिए धन प्राप्ति के लिए आज ही के दिन मां लक्ष्मी की आराधना की जाती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन अमृत वर्षा होती है और इस लिए भी खीर का महत्त्व बढ़ जाता है तथा लोग अमृत प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करते हैं. अगर लक्ष्मी पुजा की बात की जाए तो रानीगंज में सभी दुर्गा पूजा पंडालों में लखी पूजा का आयोजन होता है लेकिन रानीगंज के धोबी मोहल्ला में रानीगंज का एकमात्र लखी एवं सरस्वती मंदिर है,जबकि साधारणतः मंदिरों में लक्ष्मी एवं नारायण जी विराजमान रहते हैं .लखी पूजा के दिन यहां शाम को मेला जैसा भीड़ लगता है.पूरे इलाके के लोग इस मंदिर के लखी माता का दर्शन के लिए आते हैं . यह एक ऐतिहासिक मंदिर है .इस मंदिर की स्थापना 94 वें वर्ष पूर्व 1928 में हुई थी.मंदिर कमेटी के सचिव कल्लोल मुखर्जी बताते हैं कि मंदिर के पास ही अनिल चंद्रपाल के घर के बगल में एक छोटे से गली में लखी पूजा की जाती थी ,लेकिन 1 दिन की बात है यहां बर्नस कंपनी का निर्माण हो रहा था. बिजली का बड़ा केबल यहां जमीन के नीचे से इधर से ले जाने का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन उसमें बार-बार अड़चन आने से स्थानीय बुजुर्गों ने बताया कि इस स्थान पर लखी देवी का वास है .उस वक्त माता लक्ष्मी की पूजा की गयी थी . कंपनी के अधिकारियों ने इस बात को मानते हुए वहां एक चबूतरा बनवाया और गली में होने वाली लक्ष्मी पुजा को यहां लाकर करने से सभी बाधाएं मिट गयी तब से यहां प्रत्येक वर्ष लखी पूजा की परंपरा शुरू हो गयी. उन्होंने बताया कि पूजा के बाद दो दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं भजन कीर्तन के पश्चात प्रतिमा विसर्जन की जाएगी.



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