रानीगंज की 129 साल पुरानी 'सोलह आना दुर्गा पूजा' का भव्य विसर्जन; ऑपरेशन सिंदूर, बैंड-बाजे और झांकियों का अद्भुत नज़ारा!



रानीगंज- रानीगंज में दाल पट्टी स्थित प्रसिद्ध 129 वर्ष प्राचीन 'सोलह आना दुर्गा पूजा' की प्रतिमा का विसर्जन इस वर्ष भी अति धूमधाम और पारंपरिक उल्लास के साथ किया गया. हजारों की संख्या में भक्तों और स्थानीय लोगों ने इस भव्य विसर्जन यात्रा में हिस्सा लिया, जिसे रानीगंज में दुर्गा पूजा के समापन का प्रतीक माना जाता है.


परंपरा और विसर्जन का महत्व

पूजा कमेटी के अध्यक्ष मनोज केशरी, संयुक्त सचिव गोपाल आचार्य, और अजीत केशरी ने बताया कि यह पूजा क्षेत्र में पूजा से अधिक विसर्जन महत्व रखने वाली मानी जाती है. परंपरा के अनुसार, इस दुर्गा पूजा का विसर्जन लक्ष्मी पूजा के बाद आने वाले बुधवार को किया जाता है . रानीगंज का व्यावसायिक बंद गुरुवार को रहता है, इसलिए इसी दृष्टिकोण से विसर्जन बुधवार को किया जाता है. इस बार लक्ष्मी पूजा के बाद बुधवार जल्दी होने के कारण यह विसर्जन अगले बुधवार को किया गया.



भव्य तैयारियां और विसर्जन बजट

पूजा कमेटी के सदस्यों ने जानकारी दी कि सोलह आना दुर्गा पूजा का विसर्जन बजट भी काफी बड़ा होता है, और इसकी तैयारी सुबह से ही शुरू हो जाती है.कमेटी की तरफ से विसर्जन को एक विशेष आकर्षण बनाने के लिए खास इंतजाम किए गए है.



झांकियां और आकर्षण

इस वर्ष की विसर्जन शोभायात्रा में कई तरह के आध्यात्मिक, सामाजिक और देशभक्ति से प्रेरित झांकियां प्रस्तुत की गईं,जिनमे देशभक्ति का विशेष आकर्षण में इस बार 'ऑपरेशन सिंदूर' पर आधारित एक विशेष झाँकी तैयार की गई, जो विसर्जन का मुख्य केंद्र बिंदु रहा.सांस्कृतिक और पौराणिक झांकियां के तहत सांड और सांड की लड़ाई को सड़क पर प्रदर्शित किया गया. इसके अलावा, भूत-बेताल, जंगली व्यक्ति, और भगवान शंकर सह अन्य देवी देवताओं से संबंधित झांकियां भी थीं. मनोज केशरी ने लोगों के लिए एक विशाल हनुमान की मूर्ति का भी खुलासा किया, जो झांकी के साथ-साथ चली.उन्होंने इसे लोगों के लिए एक सुखद सरप्राइज बताया.


बैंड-बाजे और सुरक्षा व्यवस्था

विसर्जन यात्रा में 12 प्रकार के बैंड की व्यवस्था की गई, जिनमें नदिया-शांतिपुर से एकलव्य बैगपाइपर बैंड, ढोल कुरकुरी बैंड, और बांकुड़ा से ढोल-बाजे शामिल थे.इसके अलावा हल्दिया, मेदिनीपुर, बीरभूम आदि इलाकों से आए बैंड-बाजे ने देशभक्ति और धार्मिक गीत प्रस्तुत किए.


सुरक्षा और सुचारु व्यवस्था के लिए कमेटी की तरफ से 200 से अधिक स्वयंसेवकों (वॉलेंटियर्स) को परिचय पत्र के साथ रखा गया साथ ही, पुलिस प्रशासन द्वारा भी सुरक्षा के तगड़े इंतजाम किए गए थे, जिसमें कमेटी के सदस्य पुलिस के साथ समन्वय बनाकर काम कर रहे थे 


विसर्जन शोभायात्रा

शाम 7:00 बजे शोभायात्रा दाल पट्टी मोड़ से आरंभ हुई, जो एनएसबी रोड, पीएन मालिया रोड, स्टेशन रोड होते हुए रानीगंज के विभिन्न इलाकों का दौरा किया। कमेटी ने सभी से इस भव्य शोभायात्रा में सम्मिलित होने का आवाहन किया था.इसके पूर्व महिलाओं ने देवी मां को सिंदूर लगाकर तथा आपस में सिंदूर खेला करते हुए "आस्ते बच्छर आबार होबे " के नारो के साथ अश्रुपूरित नेत्रों में मां दुर्गा को विदाई किया .प्रतिमा शहर की परिक्रमा करते हुए मध्य रात्रि को तारबंग्ला स्थित कुलु पोखर में विसर्जित किया गया.


रानीगंज ही नहीं, बल्कि दूसरे स्थानों से भी लोग इस ऐतिहासिक प्रतिमा विसर्जन का नज़ारा देखने के लिए आए, पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था की पुख्ता इंतजाम की गई थी. जिससे स्पष्ट होता है कि जब तक इस 129 वर्ष प्राचीन कमेटी द्वारा प्रतिमा का विसर्जन नहीं होता, तब तक रानीगंज में दुर्गा पूजा का समापन नहीं माना जाता.

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