रानीगंज- महालया के शुभ अवसर पर, देशभर में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं.महालया को सर्वपितृ अमावस्या या पितृ विसर्जन के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन पितृपक्ष का समापन होता है, और इसी के साथ मां दुर्गा के आगमन की तैयारी शुरू हो जाती है. यह दिन पितरों की विदाई और देवी दुर्गा के स्वागत का एक अनूठा संगम है.
रानीगंज के दामोदर घाट पर उमड़ी भक्तों की भीड़
पश्चिम बंगाल के रानीगंज शहर में सुबह से ही दामोदर घाट पर भारी संख्या में श्रद्धालु देखे गए. ये सभी लोग अपने पूर्वजों को तर्पण देने के लिए वहां पहुंचे थे . धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन नदी के किनारे विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है.
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. किसी भी आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पुलिस बल के साथ-साथ रेस्क्यू टीम भी मौजूद थी. सुबह होने से पहले, शहर के विभिन्न हिस्सों में बच्चो तथा युवाओं द्वारा पटाखे फोड़े गए, जो मां दुर्गा के आगमन का संदेश दे रहे थे. यह ध्वनि पूरे रानीगंज में गूंज उठी, जिसने दुर्गा पूजा के उत्साह को और बढ़ा दिया.
महालया का धार्मिक महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति पितृपक्ष के 15 दिनों में अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर पाया हो, तो वह महालया के दिन विशेष अनुष्ठान करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है.इस दिन, ज्ञात और अज्ञात सभी दिवंगत आत्माओं के लिए श्राद्ध किया जाता है.
महालया अमावस्या पर किसी पवित्र नदी या जल तीर्थ में स्नान करना शुभ माना जाता है.स्नान के बाद, सफेद वस्त्र धारण करके सबसे पहले सूर्य देवता को अर्घ्य दिया जाता है, और फिर पितरों के लिए तर्पण किया जाता है.इसके बाद, किसी ब्राह्मण को घर बुलाकर आदर-सत्कार के साथ भोजन कराया जाता है और उन्हें अन्न-धन दान करके आशीर्वाद लिया जाता है.
यह दिन न केवल पितरों की विदाई का है, बल्कि देवी दुर्गा की नौ दिवसीय साधना का स्वागत करने का भी है. खासकर पश्चिम बंगाल में, जहां दुर्गा पूजा एक बड़ा उत्सव है, इस दिन लोगों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है.पटाखों और धार्मिक अनुष्ठानों की गूंज के बीच, महालया एक नई शुरुआत का प्रतीक बन जाता है.



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