बांकुड़ा: "सीखने की कोई उम्र नहीं होती" - इस कहावत को बांकुड़ा की छह महिलाओं ने सच कर दिखाया है। ओंदर मंदिरा प्रमाणिक, ज्योत्सना पाल, चिंतामणि प्रमाणिक, विथिका मालगोप और ज्योत्सना पाल जैसी गृहिणियों ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से यह साबित कर दिया कि यदि मन में लगन हो तो कुछ भी असंभव नहीं है।
ये महिलाएं फिलहाल सिलाई और कैटरिंग जैसे कामों से जुड़ी हैं। माध्यमिक शिक्षा के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते इनकी पढ़ाई छूट गई थी, लेकिन शिक्षा की चाहत इनके मन में हमेशा बनी रही। अब, अपने परिवार और बच्चों की देखभाल करते हुए, ये महिलाएं उच्च माध्यमिक परीक्षा दे रही हैं। ओंडा गर्ल्स हाई स्कूल के 'वोकेशनल सेक्शन' की ये छात्राएं नियमित रूप से बिष्णुपुर कृतिवास हाई स्कूल परीक्षा केंद्र पर पहुंच रही हैं।
इस लक्ष्य को पूरा करने में 'ओंदा युवा समाज' नामक स्वयंसेवी संगठन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मंदिरा प्रमाणिक, जिन्होंने 2003 में माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद शादी कर ली थी, अब अपने ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे के साथ पढ़ाई कर रही हैं। उनका बेटा अब उनका 'शिक्षक' बन गया है। मंदिरा का सपना यहीं नहीं रुकता, वे आगे भी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं।
ज्योत्सना पाल का बेटा जय पाल भी ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है। मां और बेटा दोनों एक-दूसरे की पढ़ाई में मदद करते हैं। इन महिलाओं की कहानी यह साबित करती है कि शिक्षा की कोई सीमा नहीं होती और दृढ़ संकल्प से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

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