रानीगंज-मामा घर से नाराजगी के कारण शुरू हुई थी चटर्जी परिवार का दुर्गा पूजा . करीब 300 साल पहले दुर्गा पूजा की अष्टमी के दिन मामा के घर पर जाकर यज्ञ का तिलक न लगाने पर चटर्जी परिवार के सदस्यों ने सीआरशोल गांव में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी , और उस दिन से महिलाओं द्वारा सिंदूर खेला के साथ पूजा के समग्र चरण का आयोजन किया जाता है. दुर्गा पूजा की सप्तमी पर विवाहित महिलाएं सिंदूर खेला का आयोजन करती है. दशमी के दिन विवाहित महिलायों के सिंदूर खेलने के साथ बच्चे युवा बुजुर्ग सभी के द्वारा अबीर गुलाल खेल मुख्य आकर्षणों में से एक है.
पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, सीआरशोल से लगभग सात किलोमीटर नीमचा ग्राम दूर चटर्जी परिवार के पुर्वज अपने मामा के घर पर अंचल के सबसे पुरानी दुर्गा पूजा के रूप में मनाई जाने वाली पूजा में शामिल होने अष्टमी के दिन पूरा परिवार वहां जाता था, जहां यज्ञ होता था ततपश्चात सभी को यज्ञ का तिलक लगाया जाता था. एक बार अष्टमी के दिन जब चटर्जी परिवार के सदस्य अपने मामा के घर गये तो सुना कि यज्ञ के बाद तिलक समाप्त हो गया है,उनलोगों के लिए तिलक के सामग्री नहीं रखे गये. वे खुद को अपमानित महसूस कर वापस अपने घर लौटे, औऱ नवमी के दिन कलश के माध्यम से दुर्गा पूजा शुरू किया. दशमी के दिन विवाहित महिलायों ने खुशी में सिंदूर खेला.अगले वर्ष से सप्तमी और दशमी के दिन, महिलाओं के सिंदूर और दशमी के दिन सभी यहाँ अबीर गुलाल खेलने लगे, सप्तमी ,अष्टमी के दिन बाहर के कलाकार और नवमी के दिन परिवार के छोटे और बड़े सदस्य सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं.चटर्जी परिवार में चार दिन तक कोई भी खाना नहीं बनाता. सभी एक साथ मिलकर भोजन करते हैं.
सीआरसोल गांव में इस पूजा को लेकर काफी उत्साह देखने को मिलता है.पूजा को लेकर चटर्जी परिवार के सदस्य पूजा को और अधिक आनंदमय बनाया जा सके इसकी तैयारी में जुटे हुए हैं .


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