डीवीसी एमटीपीएस के कर्मियों का दो दिसंबर से कोलकाता मुख्यालय में अनशन--



बांकुड़ा- दामोदर घाटी निगम भारत की अग्रणी बिजली उत्पादन कंपनियों में से एक है  इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत की पहली बहुआयामी योजना के साथ डिजाइन किया था .कोरोना की स्थिति में भी कंपनी के कार्यकर्ता के रूप में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे और बिजली उत्पादन को सक्रिय रखते हुए देश की प्रगति का पहिया रुकने नहीं दिया,  परन्तु उन पर अधिकारियों द्वारा वंचित किए जाने का आरोप लगाया जा रहा है.




 डीवीसी कर्मचारी संघों का संयुक्त मोर्चा दो दिसंबर से कोलकाता में अपने मुख्यालय डीवीसी टावर्स में अनिश्चितकालीन  हड़ताल पर बैठ रहे हैं . जहां तृणमूल कांग्रेस संगठनों को छोड़कर, सीटू, इंटक, बीएमएस, एटक, यूटीयूसी, जेएमएस और एचएमकेपी ने इस संयुक्त मंच में  हड़ताल का आह्वान किया है . यूनियन के नेता और सीटू-अनुमोदित डीवीसी वर्कर्स यूनियन के  कार्यवाहक अध्यक्ष समीर बाइन ने कहा, हम पिछले दो वर्षों से  उचित मांगों के साथ अपील कर रहे हैं , लेकिन डीवीसी अधिकारी तरह-तरह के बहाने बनाकर मांगों को टाल रहे हैं ,इसलिए मजबूर होकर हमें अनिश्चित काल के लिए  हड़ताल का रास्ता चुनना पड़ा है. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के निर्देशानुसार 2004 के बाद देश भर के विभिन्न संस्थाओं में नियुक्त होने वालों को पेंशन योजना से बाहर कर दिया जाएगा.  लेकिन केंद्र सरकार ने स्पष्ट रूप से एक सर्कुलर जारी कर निर्देश दिया है, कि जो लोग 2004 से पहले पैनल में शामिल हुए और बाद में नियुक्त हुए, उन्हें पेंशन योजना का लाभ मिलेगा लेकिन डीवीसी भी उस निर्देश का पालन नहीं कर रहा है.  विशेष रूप से मेजिया पावर प्रोजेक्ट के 240 भूमिहीन श्रमिक 1994 से पैनल में हैं, लेकिन डीवीसी की लापरवाही के कारण 2004 के बाद उन्हें काम पर रखा गया था . 

 यूटीयूसी नेता संजीत साहा, डीवीसी स्टाफ एसोसिएशन के सचिव रंजीत मंडल ने मांग की है कि वे सभी भूमिहारों को हड़ताल के बल पर  पेंशन के तहत लाने के लिए आंदोलन जारी रखेंगे,  साथ ही उनकी गंभीर शिकायत यह है कि अधिकारियों की पदोन्नति नियमों के अनुसार होती है लेकिन कर्मचारियों की पदोन्नति में, काफी समय से देरी हो रही है.

  श्रमायुक्त के साथ बार-बार त्रिपक्षीय बैठक करने के बाद भी वे कोई  समाधान  न निकलने के करण  हड़ताल के रास्ते आंदोलन शुरू कर रहे हैं.  संगठन के नेताओं ने कहा कि अगर मांगें पूरी नहीं की जाती हैं, तो पीछे हटने का कोई सवाल नही .

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