रेलवे के नोटिस से सहमे बर्न स्टैंडर्ड के पूर्व कर्मियों के परिवार, हजारों लोगों पर बेघर होने का संकट



रानीगंज : वर्ष 2022 में रानीगंज के लाएक बांध, महावीर गंज, तीन नंबर नेपाली धावड़ा सहित आसपास के कई इलाकों की बर्न स्टैण्डर्ड की जमीन रेलवे को हस्तांतरित किए जाने के बाद वहां बने क्वार्टरों में रहने वाले लोगों के बीच अनिश्चितता और भय का माहौल व्याप्त है. रेलवे की ओर से इन क्वार्टरों को खाली करने के लिए लगातार नोटिस जारी किए जाने से करीब एक हजार परिवारों के सामने बेघर होने का संकट खड़ा हो गया है. बीते दिन भी यहां रहने वाले सैकड़ो परिवार को यह जगह रेलवे विभाग द्वारा खाली करने की नोटिस जारी की गई है.



इस नोटिस को पाकर स्थानीय निवासियों का कहना है कि इनमें से अधिकांश परिवार पिछले चार से सात दशकों से इन क्वार्टरों में रह रहे हैं. कई लोग बर्न स्टैंडर्ड कंपनी के कर्मचारी रह चुके हैं.उनका आरोप है कि कंपनी बंद होने के बाद भी उन्हें उनका बकाया भुगतान नहीं मिला है और अब बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के घर खाली करने के लिए कहा जा रहा है. लोगों का कहना है कि कोई 40 वर्ष, कोई 50 वर्ष और कोई 70 वर्षों से इन क्वार्टरों में रह रहा है. ऐसे में अचानक बेदखली की कार्रवाई उनके सामने गंभीर संकट पैदा कर रही है.



इस मुद्दे पर सीटू नेता उमापदो गोप ने बताया कि रेलवे द्वारा बार-बार नोटिस देकर लोगों को परेशान किया जा रहा है.उन्होंने कहा कि नवंबर 2025 में वामपंथी संगठनों की ओर से रानीगंज स्टेशन मास्टर के माध्यम से आसनसोल मंडल के डीआरएम को ज्ञापन सौंपा गया था. उसकी प्रति स्थानीय लोगों को भी उपलब्ध कराई गई है.



उन्होंने दावा किया कि बर्न स्टैंडर्ड के पूर्व कर्मचारियों का करोड़ों रुपये का बकाया आज भी लंबित है. इस संबंध में दुर्गापुर ट्रिब्यूनल में मामला चला था, जिसमें कंपनी पक्ष को राहत नहीं मिली थी. वर्तमान में यह मामला कोलकाता उच्च न्यायालय में लंबित है.उनका सवाल है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तब रेलवे किस आधार पर लोगों को बेदखली का नोटिस जारी कर रहा है.


सीटू नेता ने जमीन के स्वामित्व पर भी सवाल उठाया है.उनका कहना है कि यह भूमि मूल रूप से बंगाल कोल कंपनी की लीजहोल्ड जमीन थी, जिसे बर्न स्टैंडर्ड के संस्थापक वीरेन मुखर्जी ने लीज पर लिया था. बाद में यह कंपनी केंद्र सरकार के अधीन आ गई. वर्ष 2018 में एनसीएलटी के फैसले के बाद बर्न स्टैंडर्ड रेलवे मंत्रालय के अधीन रही.ऐसे में रेलवे को भूमि का स्वामित्व कब और कैसे प्राप्त हुआ, यह स्पष्ट नहीं है.


वामपंथी संगठनों ने कहा है कि 30 जून से पहले इस मुद्दे को लेकर फिर से आंदोलन और अभियान चलाया जाएगा. स्थानीय लोगों ने इस संबंध में क्षेत्र के भाजपा विधायक पार्थो घोष को भी अपनी समस्या से अवगत कराया है.


हालांकि, इस पूरे मामले पर रेलवे की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. स्थानीय लोग अब न्यायालय के फैसले और प्रशासनिक हस्तक्षेप की उम्मीद लगाए हुए हैं, ताकि वर्षों से बसे परिवारों को बेघर होने से बचाया जा सके.

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