जामुड़िया- विद्रोही कवि काजी नज़रुल इस्लाम की जन्मस्थली चुरुलिया में स्थित 'संग्रहालय' को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद आखिरकार सुलझता नजर आ रहा है. काजी नज़रुल विश्वविद्यालय और कवि के परिवार के बीच 'कब्जे' को लेकर बनी कड़वाहट को दूर करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. उदय बनर्जी ने स्पष्ट किया कि प्रशासन का उद्देश्य कब्जा करना नहीं, बल्कि कवि की विरासतों को सुरक्षित करना है.
मरम्मत होने तक विश्वविद्यालय में सुरक्षित रहेंगी धरोहरें
सोमवार को चुरुलिया पहुंचे कुलपति डॉ. उदय बनर्जी ने संग्रहालय भवन का निरीक्षण किया और परिवार के सदस्यों से बातचीत की. उन्होंने बताया की वर्तमान संग्रहालय भवन की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है.बारिश और नमी से बहुमूल्य सामग्री को नुकसान पहुंचने का खतरा है. राज्य सरकार के पर्यटन विभाग ने संग्रहालय के पुनर्निर्माण के लिए विशेष फंड आवंटित किया है. जब तक भवन का निर्माण कार्य चलेगा, तब तक संग्रहालय में रखी कवि की निशानियों और स्मृतियों को काजी नज़रुल विश्वविद्यालय में पूरी सुरक्षा के साथ रखा जाएगा.निर्माण कार्य पूर्ण होते ही इन्हें ससम्मान वापस चुरुलिया लाया जाएगा.
प्रशासनिक अमले की मौजूदगी में हुई चर्चा
इस महत्वपूर्ण बैठक के दौरान कुलपति के साथ जिला और ब्लॉक प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे. इनमें मुख्य रूप से तापस पाल (बीडीओ, जामुड़िया),कौशिक सिन्हा (एडीएम),अदिति गांगुली (पर्यटन प्रभारी, राज्य सरकार),डॉ. दीपांकर मजूमदार (प्रधान शिक्षक, नज़रुल विद्यापीठ)सोनाली काजी (नज़रुल परिवार की सदस्य) के साथ कवि प्रसनजीत घोष और स्थानीय निवासी शामिल रहे.
"मैं खुद कवि का मुरीद हूँ" : कुलपति
विवाद पर पूर्ण विराम लगाते हुए प्रोफेसर बनर्जी ने भावुक होकर कहा, "मैं खुद काजी नज़रुल इस्लाम का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ।.मेरी प्राथमिकता यह है कि इस समस्या का समाधान एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में हो. हम चाहते हैं कि इस संग्रहालय को एक नया और आधुनिक रूप मिले ताकि आने वाली पीढ़ियां कवि के योगदान को करीब से देख सकें."
परिजनों ने जताई राहत
पिछले कुछ समय से परिवार के सदस्य इस बात को लेकर आशंकित थे कि विश्वविद्यालय इस संग्रहालय पर पूर्ण नियंत्रण करना चाहता है, लेकिन आज की स्पष्ट वार्ता और प्रशासनिक आश्वासन के बाद गांव वालों और परिवार के बीच व्याप्त भ्रम की स्थिति दूर होती दिखी.



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