रानीगंज-प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की 145 वीं जयंती के अवसर पर त्रिवेणी देवी भालोटिया कॉलेज, रानीगंज के हिंदी विभाग द्वारा एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. इस व्याख्यान का विषय था – “आज के दौर में प्रेमचंद का महत्व”. कार्यक्रम की शुरुआत मुंशी प्रेमचंद और कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण से हुई. इसके उपरांत दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया गया.
कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग की प्राध्यापिका डॉ. मीना कुमारी ने किया, जबकि स्वागत भाषण हिंदी विभाग के यू.जी. अध्यक्ष डॉ. आलम शेख ने दिया. उन्होंने मंच पर उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत कर कार्यक्रम की भूमिका रखी.कार्यक्रम में उपस्थित विद्यार्थियों ने स्वागत गीत और सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को सरस बना दिया.
इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. अरुण होता, प्राध्यापक, हिंदी विभाग, पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय, बारासात, कोलकाता उपस्थित रहे. उन्हें टी.डी.बी. कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य प्रोफेसर मिलन मुखर्जी ने उत्तरीय और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया. अर्थशास्त्र विभाग के प्राध्यापक मो. फकुरुद्दीन ने मुख्य वक्ता को प्रतीक चिह्न भेंट किया. टीसीएस विभाग के अनूप भट्टाचार्य ने प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान पर अपने विचार साझा किए.
कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका डॉ. मंजुला शर्मा ने की. उर्दू विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. साबेरा खातून ने प्रेमचंद की रचनाओं में उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं में लेखन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “प्रेमचंद हमारी साझी सांस्कृतिक विरासत हैं, जिनकी रचनाओं में वतनपरस्ती, सामाजिक न्याय और स्त्री सम्मान की भावना स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है.”
विद्यार्थियों द्वारा स्वरचित कविताओं का पाठ भी किया गया. पीजी से रोशनी रजक, अर्जुन कुमार डोम, प्रियंका महतो, निर्मल कुमार ठाकुर, तथा यू.जी. से अमन हेला, आशिया परवीन, आरती कुमारी साव, आसिया प्रवीण ने सराहनीय प्रस्तुति दी.
हिंदी विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. गणेश रजक ने मुख्य वक्ता डॉ. अरुण होता के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय देते हुए प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा की विशेषताओं को साझा किया.
मुख्य वक्ता डॉ. अरुण होता ने अपने वक्तव्य में प्रेमचंद के स्त्री पात्रों की सशक्त उपस्थिति को रेखांकित करते हुए कहा की “प्रेमचंद के स्त्री पात्र – धनिया, झुनिया, मुन्नी आदि – पुरुष पात्रों की तुलना में कहीं अधिक सशक्त, मुखर और निर्णायक हैं. उन्होंने ‘सेवासदन’ उपन्यास का उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार प्रेमचंद ने नारी सम्मान की पैरवी की. प्रेमचंद का साहित्य आज भी प्रासंगिक है क्योंकि उन्होंने उपभोक्तावादी संस्कृति और संबंधों में आती कृत्रिमता की चिंता बहुत पहले ही जता दी थी.”
डॉ. होता ने यह भी कहा कि आज का दौर सिर्फ वर्तमान नहीं, बल्कि पिछले 25-30 वर्षों की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना में आए परिवर्तन का परिणाम है, जिसे प्रेमचंद की दृष्टि में देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने आने वाली विघटनकारी प्रवृत्तियों की आशंका बहुत पहले ही प्रकट कर दी थी.
कार्यक्रम में आसनसोल हिंदी अकादमी के सदस्य मनोज यादव ने ‘गोदान’ के माध्यम से कृषक जीवन के संघर्ष पर बात करते हुए प्रेमचंद को आज भी अत्यंत प्रासंगिक बताया.हिंदी अकादमी के सचिव भोला हेला ने कॉलेज को अपना दूसरा घर बताते हुए कहा कि प्रेमचंद की रचनाएं आज भी समाज को दिशा दिखाने वाली मशाल हैं.
इस अवसर पर कॉलेज के अनेक प्राध्यापकगण
पी.जी. समन्वयक, हिंदी विभाग के डॉ. वसीम आलम
,हिंदी विभाग की प्राध्यापिका डॉ. किरणलता दूबे, रीना तिवारी, डॉ. सौमेन पुरकैत,भौतिक शास्त्र विभाग के मृणाल कांति मंडल,राजनीतिक शास्त्र विभाग डॉ. जंयतो मंडल .साथ ही कॉलेज के विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं विभिन्न विभागों के अध्यापकगणों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को सफल और स्मरणीय बना दिया.


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